Wednesday, April 23, 2025

भलाई के पाले में आकर तो देखो

#विषय- गजल
# काफिया -आ स्वर 
#रफीद -कर तो देखो। 
१२२ १२२ १२२ १२२

भलाई के पाले में आकर तो देखो।
बुराई से खुद को बचाकर तो देखो।।१

सानी मतला 
लबों पे तरन्नुम सजाकर तो देखो।
मुहब्बत की धुन गुनगुनाकर देखो।।२

सुकूँ के लिए क्यों भटकते हो इतना।
किसी को सुकूँ दे दिलाकर तो देखो।।३

ये लोहा अगरचे बहुत सख़्त जाँ है।
ज़माना झुकेगा झुकाकर तो देखो।।४

मिटेगा तभी तो गुरूर -ओ- तकब्बुर।
हकीकत सभी को दिखाकर तो देखो।।५

पुराने अगर यार, रूठे हुए हैं।
चलो जाओ उनको मनाकर तो देखो।।६
मक्ता 
वो ज्ञानेश्वर हल करेगा करेगा,
उसे मस्अला तुम बताकर तो देखो।।७

ग़जलकार 
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी
राजस्व एवं कर निरीक्षक 
जनपद बिजनौर उत्तर प्रदेश 
स्वरचित एवं मौलिक ग़ज़ल के ©®



सर्वाधिकार सुरक्षित हैं।

Saturday, September 24, 2022

ग़ज़ल क़ाफिया -अत रदीफ - नहीं मिलती।। रुक्न २२१२ २२१२ २२१२ २२ कुदरत नहीं मिलती उसे, कुदरत नहीं मिलती। २ जिस शख्स के सीने में, मुहब्बत नहीं मिलती।। जो ख़र्च से बचता है, ज़रूरत की जगह भी। २ उस शख़्स के घर में कभी, बरकत नहीं मिलती।। हर दुख पे खड़ा रहता है, एक और नया दुख। २ उफ़्फ़ , रंज़ो अलम से हमें, राहत नहीं मिलती।। दो ज़ानू हुआ बैठा, मिलेगा तुम्हें अक्सर। २ उस फूल के जैसी कहीं, आदत नहीं मिलती।। हर शख़्स में बस आग, मुहब्बत की मिली है। २ मुझको किसी सीने में भी, नफरत नहीं मिलती।। मक्ता बतौरे खास माँ-बाप से बेटों को जो मिलती है, वो.."ज्ञानेश"। २ माँ-बाप को बेटों से, सहूलत नहीं मिलती।। ग़ज़लकार ज्ञानेश्वर आनन्द "ज्ञानेश" किरतपुरी राजस्व एवं कर निरीक्षक नगर पालिका परिषद बसी किरतपुर जनपद बिजनौर उत्तर प्रदेश सम्पर्क सूत्र- 9719677533 Email id- gyaneshwar533@gmail.com स्वरचित एवं मौलिक ग़ज़ल के समस्त ©® अधिकार सुरक्षित हैं।

Wednesday, April 13, 2022

ग़ज़ल

छोड़ देती है दुनिया सबको रोते हुए।
देखा है नज़रों ने सब कुछ होते हुए।।

फाँसलों को भी कैसे मिटाओगे तुम।
मिल ना पाओगे तुम पास होते हुए।।

हमने आँसू तो बहने से रोके बहुत। 
बह गए हैं वो पल्लू भिगोते हुए।।

अपने ही जब हमसे बिछुड़ने लगे।
धागा बनें माला मोती पिरोते हुए।।

पढ़ी थी तरन्नुम से जो ग़ज़ल आपने।
दिल से ज्ञानेश को भी संजोते हुए।।
ग़ज़लकार
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी
राजस्व एवं कर निरीक्षक
ग़ज़ल के समस्त ©® अधिकार सुरक्षित हैं।

Wednesday, April 6, 2022

स्वरचित दोहे

सुप्रभात दोहे प्रस्तुत हैं-

लाज शर्म सब भूलकर, निकल पड़े हैं पाँव।
शहरों को सब भागते, छोड़ चले है गाँव।।

शुद्ध हवा पानी नहीं, शुद्ध नहि खान-पान।
ख़राब शहरों की दशा, गाँव को शुद्ध जान।।

नई नई बीमारियां, फैले है निज धाम।
बीमारी के सामने , आये ना कुछ काम।।

ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी

Monday, January 3, 2022

ग़ज़ल

ग़ज़ल 

             चाँद चेहरे
उस पे उस विधाता को, आक्रोश आता है ।
जो किसी भी इंसाँ को, बेसबब सताता है।।

रोज़ मर रहा हूं मैं, इस तड़प के ख़ंज़र से।
मेरा क़त्ल क्यों मुन्सिफ, शहर से छुपाता है।।

इस क़दर सताया है, मुझको चाँद चेहरे ने। 
दर्द से कलेजा तक, भाई मुँह को आता है।।

मेरे शहर में ऐसा, एक अजब शराबी है।
रोज़ ही कमाता है, रोज़ ही गँवाता है।।

उससे क्या बताऊँ मैं, अपने दिल की बेताबी।
वो मेरी ज़रूरत का, फायदा उठाता है।।

देख कर उसे "ज्ञानेश", आँख ने कहा दिल से।
इस हसीं से लगता है, हर जनम का नाता है।।

ग़ज़लकार
ज्ञानेश्वर आनन्द "ज्ञानेश" किरतपुरी
राजस्व एवं कर निरीक्षक
सम्पर्क सूत्र-

Saturday, January 1, 2022

प्यार ज्ञानेश करना ख़ता तो नहीं।

वैसे मैंने अभी तक, किया तो नहीं।
प्यार ज्ञानेश करना, ख़ता तो नहीं।।

जाने क्यों उनकी नज़रों में, मुजरिम हैं हम।
जबकि कुछ हमसे ऐसा हुआ तो नहीं।।
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी

Tuesday, November 30, 2021

ग़ज़ल

ग़ज़ल

वैसे मैंने अभी तक किया तो नहीं।
प्यार "ज्ञानेश" करना ख़ता तो नहीं।।

आपको  जो भी  कहना था, सब कह दिया?
आपको हमसे अब कुछ , गिला तो नहीं।।

किस लिए मुझपे बाग़ी का इल्ज़ाम है।
झूठ को झूठ कहना,  ख़ता तो नहीं।।

तोहफातन फूल भेजे हैं, किसने हमें।
ये हमारी वफ़ा का, सिला तो नहीं।।

जाने क्यों उनकी नज़रों में, मुजरिम हैं हम।
जबकि कुछ हमसे ऐसा हुआ तो नहीं।

हमने दिल खोलकर रख दिया सामने।
यानि अब आपसे कुछ, छुपा तो नहीं।।

मैं दुआ जानता हूँ, पता तो करो।
उसके लब पे कहीं बद्दुआ तो नहीं।।

स्वरचित एवं मौलिक ग़ज़ल के समस्त ©® अधिकार सुरक्षित हैं।
ग़ज़लकार
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी
राजस्व एवं कर निरीक्षक

Sunday, November 28, 2021

नशा मुक्ति पर स्वरचित दोहे

नशा मुक्ति पर कुछ दोहे लिखे हैं-👇 
1-दुनिया में नशा मुक्ति का, हो कोई अभियान।
   जीवन  बचे  कलंक से,   समझो ए नादान।।
2- धूम्रपान से लाभ नहीं, खुद का भी नुक्सान।
    धूम्रपान को त्याग कर, मिलता है सम्मान।।
3- दिल से जो कोशिश करें, छोड़े वो धूम्रपान।
    जीवन सफल बनाइए , छोड़ कर धूम्रपान।।
4- नित नित  बढ़ती है सदा , गृह कलेश की बात।
    दिन काटे कटता नहीं ,  कटै नहीं ये रात।।
5- शराबी जब नशा करे , घर में करें उत्पात।
    तिल-तिल कर मिटती रहे, यह नारी की जात।।
6-खुशियाँ भी ओझल हुईं, सुख मिले नहीं चैन।
   जीवन दूभर हो रहा , दिन हो चाहे रैन।।
7-नशा बना अभिशाप है, हो शरीर का नाश।
   जगत में नशा आज तो, बना गले का फाँस।।
8-कलंक बने समाज में, नशा पाप का मूल।
   घुटन सी महसूस करे,चुभता जैसे शूल।।
9- छोड़ो नशा तुम आज से, करो प्रतिज्ञा आज।
     खुशियों से घर हो भरा, बैठो बीच समाज।।10-नज़रें बच्चों पर रखें, दियो उन्हें समझाय।
      संग नशे का है बुरा, निकट कभी ना जाय।।
11- नशा एक नासूर है, रहिए इससे दूर।
      मान घटे संसार में, साए भी हों दूर।।
12- करिए मदद ग़रीब की,अच्छे कीजै काम।
      ग़ैर का भी हो भला, हो अपना भी नाम।।
13-"ज्ञानेश" इस समाज में, कियो कोई सुधार।
      जीवन सफल बनाइए, कर कोई उपकार।।
            दोहाकार 
ज्ञानेश्वर आनन्द "ज्ञानेश" किरतपुरी
बसी किरतपुर
जनपद बिजनौर (उत्तर प्रदेश)

Monday, November 1, 2021

ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी के दोहे



ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी के दोहे 

१- देने से घटता नहीं,  बढ़ता है दिन-रात।
     विद्या-धन संसार में , बाँट सके नहि भ्रात।।

२- जगत में भ्रष्टाचार का, फैला ऐसा जाल ।
    सत्य भुला कर मित्र भी, कुटिल चले है चाल।।
    
३ -भ्रष्टाचारी मौज करें, हैं परिश्रमी मलाल।
    शिक्षा के घोटाले में, लोभी फँसे दलाल।।

४- देखो निंदकों का तुम, दिल से करना मान।
    जिनसे भीतर छुपि कमी, का मिलता है ज्ञान।।

५- रोज नए प्रयोग काव्य, सिरजन का हो ध्यान।
    त्याग कुरीति  सँसार की, करो काव्य सोपान ।।
     
६- मिटे साँसारिक कुरीति, अरु दूर हो अज्ञान।
     सम्मान धनी का होवै, निर्धन का भी मान।।
    
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मजदूरों के दर्द पर "ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश" के दोहे

१- लॉकडाउन में फँस गए,  बेचारे मजदूर।
     खाने को भोजन नहीं, घर से हैं अति दूर।।

२- मालिक पल्ला झाड़ी कै, खड़े हुए हैं दूर।
     संकट की इन घड़ियों में, भूख बनी नासूर।।
      
३- प्रशासन कुछ करे नहीं, भूखे हैं मजदूर।
     पैदल चलने पर सभी, बेबस हैं मजबूर।।
     
 ४-घर जाने को वापसी, पैदल चले मजदूर।
    मिली उन्हें गाड़ी नहीं, पाँव हुए मजबूर।।
 
 ५- घर वापसी को पैदल, चल हुए चकनाचूर।
     पैरों में छाले पड़े, मंजिल है अति दूर।।
    

दोहा रचनाकार
ज्ञानेश्वर आनन्द "ज्ञानेश"
राजस्व एवं कर निरीक्षक
किरतपुर जिला बिजनौर
(उत्तर प्रदेश)

Sunday, October 31, 2021

प्यार करते हैं कोई ख़ता तो नहीं

प्यार करते हैं कोई ख़ता तो नहीं।
दिल में क्या है तुम्हारे पता तो नहीं।।

आज आँखों से आँखे मिला लीजिए।
कल कहां हों किसी का पता तो नहीं।।

तुमने कितना कुछ मुझको कह तो दिया।
पर किसी बात का मुझे,अब गिला तो नहीं।।

स्वरचित एवं मौलिक रचना
ज्ञानेश्वर आनन्द "ज्ञानेश" किरतपुरी
राजस्व एवं कर निरीक्षक

Thursday, October 14, 2021

कुदरत नहीं मिलती उसे, कुदरत नहीं मिलती।
जिस शख्स के सीने में, मुहब्बत नहीं मिलती।।
शायर
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी

ग़ज़ल का मतला

इस सूरत भी दुनिया में अब, ऐब छुपाए जाते हैं।
चाँद से उजले दामन पर कुछ, दाग़ लगाए जाते हैं।।
शायर
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी

Friday, October 1, 2021

"स्वच्छ भारत अभियान"

स्वच्छ भारत अभियान चलेगा,  
जन-जन में यह पैगाम मिलेगा।  
स्वच्छता का जीवन आधार बनेगा, 
अपना नगर स्वच्छ और साफ रहेगा। 
कूड़ा करकट  भी नहीं मिलेगा,   
जब स्वच्छ भारत अभियान चलेगा।  
अपने घर सभी कूड़ादान रखेंगे, 
पालिका कूड़ा गाड़ी में ही डालेंगे। 
भारत को विकसित करने को, 
आपस में स्नेह और प्यार बढे़गा।  
दूषित भावनाओं का प्रसार मिटेगा, 
"भारती" को सब का साथ रहेगा।  
रचनाकार 
ज्ञानेश्वर आनन्द  "ज्ञानेश" 
राजस्व एवं कर निरीक्षक 
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Tuesday, September 7, 2021

एक थैली के चट्टे-बट्टे

एक थैली के चट्टे-बट्टे

लोक लुभावन करते वादे और मूर्ख बनाते जनता को।
सब एक थैली के चट्टे-बट्टे हैं नहीं सुहाते जनता को।।
सब अपनी झोली भरते हैं जनता का ये क्या करते हैं।
पाँच साल तक खून चूसते कुछ नहीं बताते जनता को।।
बेशर्मी इनकी देखो कैसे वोट मांगते फिर जनता से।
एक दूजे पर दोषारोपण कर फिर धता बताते जनता को।।
पहले तो कुछ कर ना सके अब नये वादे करते जनता से।
महँगाई का रोना रोकर सब्ज बाग दिखाते जनता को।।
पढ़-लिख के भी पकौड़े तले तो क्या फायदा है पढ़ने का।
रोजगार को चौपट कर अब स्वप्न दिखाते जनता को।।
सरकारी सम्पत्तियाँ बेचकर पेट पालने वालों को देखो।
"ज्ञानेश"अपनों का हित साधने वाले तड़पाते जनता को।।
रचनाकार
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी
राजस्व एवं कर निरीक्षक

Saturday, June 19, 2021

शे'र

इक ख़्याल उनका ज़हन में तो आया मगर। 
उनके ख़्याल ने शायद मुझे  तरसाया बहुत।। 
शायर 
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी

Saturday, May 22, 2021

ये दिल मचलता क्यों है।

ग़ज़ल
 १२२  १२२२   २२१२   २१२२
उसे देखकर ये दिल यूँ मचलता क्यों है।
तिरे आने से पहले दिल सँभलता क्यों है।।

तिरी याद आती है जब मुझे तन्हाई में।
इश्क़ की गर्मी से बदन जलता क्यों है।।

जब उसे मुझसे दूर ही जाना था तो।
प्यार आँखों से दिल में उतरता क्यों है।।

भोली सी सूरत क्या-क्या ज़ुल्म ढ़ाती है।
मेरा हर एक बोल उसे अख़रता क्यों है।

दुनिया जिसे नाहक बुरा समझती है।
ये इश्क़ ए जूनून दिल में पलता क्यों है।।

जब कोई उसकी बात करता है "ज्ञानेश"।
ये दिल टूट कर इतना बिखरता क्यों है।।

          ग़ज़लकार
ज्ञानेश्वर आनन्द "ज्ञानेश" किरतपुरी
राजस्व एवं कर निरीक्षक
ग़ज़ल के ©® सर्वाधिकार सुरक्षित हैं।

Friday, May 21, 2021

"अपनों को खोया है"

संवेदना भरी  ग़ज़ल
"अपनों को खोया है"

इस जहां में जिन्होंने अपनों को खोया है।
दिल पर पत्थर रखकर वो बहुत रोया है।।

कल तलक जिसको सामने बैठे देखा था।
कोरोना ने अपनों को दूर कर कैसे खोया है।।

सपना सा लगता है कल ही की तो बात है।
खाने को रोज की तरह हाथ अपना धोया है।।

आज अपने भी नहीं अपने दिखाई दे रहे हैं।
आज उसी का नाम उसने दिलों पर बोया है।।

जिंदगी कैसे-कैसे इम्तिहान लेती है "ज्ञानेश"।
चुन चुन कर यादों को मोती सा पिरोया है।।

ग़ज़लकार
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी
राजस्व एवं कर निरीक्षक
ग़ज़ल के समस्त अधिकार ©® सुरक्षित हैं।

Saturday, May 8, 2021

मफ़-ऊ-ला-त    फ़ा-इ-ला-तुन  फ़ा-इ-लुन
२२२१     २२२१       २१२२          २१२

ग़ज़ल

मिलने आज वो हमसे मित्र पुराने आए हैं।
फिर वो हमसे नज़दीकियाँ  बढ़ाने आए हैं।।

अदब से दूर तलक नहीं है वास्ता जिनका।
बातें शऊर की वो हमको सिखाने आये हैं।।

पता नहीं खुद ही हमसे रूठ बैठे थे मियां।
सुना है अब उनके होश ठिकाने आये हैं।।

पता जिनको नहीं है खुद के हालातों का।
वो हाल तकदीर का मेरी बताने आये हैं।।

जो कभी बोलने को भी नहीं तैयार थे हमसे।
आज वो फिर हमारा दिल लुभाने आये हैं।।

जिनकी फितरत है दूसरों को दोषी करार की।
कोई इल्जाम क्या वो फिर लगाने आये हैं।।

भरोसा अब नहीं रहा हमें जिनकी बातों पर।
नया वो दाव कोई हम पर आजमाने आये हैं।।

"ज्ञानेश" उसने तो हमें ठुकरा ही दिया था।
सुना है फिर से वो हमको मनाने आये हैं।।

ग़ज़लकार
ज्ञानेश्वर आनन्द "ज्ञानेश" किरतपुरी
स्वरचित एवं मौलिक रचना के समस्त अधिकार सुरक्षित हैं। © ®

ग़ज़ल

फायलातुन- फायलातुन - फऊलुन -फऊलुन - मुतदारिक 
ग़ज़ल
अब हमें अपना मुकद्दर बनाना पड़ेगा।।
कुछ पाने को हाथ-पांव चलाना पड़ेगा।।

तुम गीतों में आनन्द तो चाहते हो मगर।
तुम्हें तरन्नुम से ग़ज़लों को गाना पड़ेगा।।

तुम्हें रश्मे उल्फत बढ़ाने से पहले मेरी जाँ।
दिल में मुहोब्बत का परचम लहराना पड़ेगा।।

मुश्किल में कुछ भी दिखाई नहीं देता अक्सर।
इस दिल की आंखों पे चश्मा लगाना पड़ेगा।।

खुदा का करम है या है मेरा ये मुकद्दर।
अब जिंदगी में मेरी तुमको आना पड़ेगा।।

क्या खबर थी के वबा फैलेगी "ज्ञानेश"।
कोरोना से घरों में सिमट जाना पड़ेगा।।

ग़ज़लकार
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी
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