Monday, November 1, 2021

ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी के दोहे



ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी के दोहे 

१- देने से घटता नहीं,  बढ़ता है दिन-रात।
     विद्या-धन संसार में , बाँट सके नहि भ्रात।।

२- जगत में भ्रष्टाचार का, फैला ऐसा जाल ।
    सत्य भुला कर मित्र भी, कुटिल चले है चाल।।
    
३ -भ्रष्टाचारी मौज करें, हैं परिश्रमी मलाल।
    शिक्षा के घोटाले में, लोभी फँसे दलाल।।

४- देखो निंदकों का तुम, दिल से करना मान।
    जिनसे भीतर छुपि कमी, का मिलता है ज्ञान।।

५- रोज नए प्रयोग काव्य, सिरजन का हो ध्यान।
    त्याग कुरीति  सँसार की, करो काव्य सोपान ।।
     
६- मिटे साँसारिक कुरीति, अरु दूर हो अज्ञान।
     सम्मान धनी का होवै, निर्धन का भी मान।।
    
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मजदूरों के दर्द पर "ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश" के दोहे

१- लॉकडाउन में फँस गए,  बेचारे मजदूर।
     खाने को भोजन नहीं, घर से हैं अति दूर।।

२- मालिक पल्ला झाड़ी कै, खड़े हुए हैं दूर।
     संकट की इन घड़ियों में, भूख बनी नासूर।।
      
३- प्रशासन कुछ करे नहीं, भूखे हैं मजदूर।
     पैदल चलने पर सभी, बेबस हैं मजबूर।।
     
 ४-घर जाने को वापसी, पैदल चले मजदूर।
    मिली उन्हें गाड़ी नहीं, पाँव हुए मजबूर।।
 
 ५- घर वापसी को पैदल, चल हुए चकनाचूर।
     पैरों में छाले पड़े, मंजिल है अति दूर।।
    

दोहा रचनाकार
ज्ञानेश्वर आनन्द "ज्ञानेश"
राजस्व एवं कर निरीक्षक
किरतपुर जिला बिजनौर
(उत्तर प्रदेश)

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