संवेदना भरी ग़ज़ल
"अपनों को खोया है"
इस जहां में जिन्होंने अपनों को खोया है।
दिल पर पत्थर रखकर वो बहुत रोया है।।
कल तलक जिसको सामने बैठे देखा था।
कोरोना ने अपनों को दूर कर कैसे खोया है।।
सपना सा लगता है कल ही की तो बात है।
खाने को रोज की तरह हाथ अपना धोया है।।
आज अपने भी नहीं अपने दिखाई दे रहे हैं।
आज उसी का नाम उसने दिलों पर बोया है।।
जिंदगी कैसे-कैसे इम्तिहान लेती है "ज्ञानेश"।
चुन चुन कर यादों को मोती सा पिरोया है।।
ग़ज़लकार
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी
राजस्व एवं कर निरीक्षक
ग़ज़ल के समस्त अधिकार ©® सुरक्षित हैं।
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