सुप्रभात दोहे प्रस्तुत हैं-
लाज शर्म सब भूलकर, निकल पड़े हैं पाँव।
शहरों को सब भागते, छोड़ चले है गाँव।।
शुद्ध हवा पानी नहीं, शुद्ध नहि खान-पान।
ख़राब शहरों की दशा, गाँव को शुद्ध जान।।
नई नई बीमारियां, फैले है निज धाम।
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी
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