Wednesday, April 6, 2022

स्वरचित दोहे

सुप्रभात दोहे प्रस्तुत हैं-

लाज शर्म सब भूलकर, निकल पड़े हैं पाँव।
शहरों को सब भागते, छोड़ चले है गाँव।।

शुद्ध हवा पानी नहीं, शुद्ध नहि खान-पान।
ख़राब शहरों की दशा, गाँव को शुद्ध जान।।

नई नई बीमारियां, फैले है निज धाम।
बीमारी के सामने , आये ना कुछ काम।।

ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी

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