ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी के दोहे
१- देने से घटता नहीं, बढ़ता है दिन-रात।
विद्या-धन संसार में , बाँट सके नहि भ्रात।।
२- जगत में भ्रष्टाचार का, फैला ऐसा जाल ।
सत्य भुला कर मित्र भी, कुटिल चले है चाल।।
३ -भ्रष्टाचारी मौज करें, हैं परिश्रमी मलाल।
शिक्षा के घोटाले में, लोभी फँसे दलाल।।
४- देखो निंदकों का तुम, दिल से करना मान।
जिनसे भीतर छुपि कमी, का मिलता है ज्ञान।।
५- रोज नए प्रयोग काव्य, सिरजन का हो ध्यान।
त्याग कुरीति सँसार की, करो काव्य सोपान ।।
६- मिटे साँसारिक कुरीति, अरु दूर हो अज्ञान।
सम्मान धनी का होवै, निर्धन का भी मान।।
***************************************
मजदूरों के दर्द पर "ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश" के दोहे
१- लॉकडाउन में फँस गए, बेचारे मजदूर।
खाने को भोजन नहीं, घर से हैं अति दूर।।
२- मालिक पल्ला झाड़ी कै, खड़े हुए हैं दूर।
संकट की इन घड़ियों में, भूख बनी नासूर।।
३- प्रशासन कुछ करे नहीं, भूखे हैं मजदूर।
पैदल चलने पर सभी, बेबस हैं मजबूर।।
४-घर जाने को वापसी, पैदल चले मजदूर।
मिली उन्हें गाड़ी नहीं, पाँव हुए मजबूर।।
५- घर वापसी को पैदल, चल हुए चकनाचूर।
पैरों में छाले पड़े, मंजिल है अति दूर।।
दोहा रचनाकार
ज्ञानेश्वर आनन्द "ज्ञानेश"
राजस्व एवं कर निरीक्षक
किरतपुर जिला बिजनौर