Friday, September 25, 2020
तक़ब्बुर इसी तरह से तकब्बुर का शहर गिरता है। के जैसे आइना गिरता है और बिखरता है।। जो दूर होके भी हर दम क़रीब लगता है। वही तो है जो मुहोब्बत दिलों में भरता है।। कहीं पे कोई तलबगार तो नज़र आये। शऊर यूं ही फलक से कहां उतरता है।। भले ही लफ्जे़ मुहोब्बत का इल्म हो के न हो। जिसे भी देखो मुहोब्बत की बात करता है।। शरीफ़ शख़्स को हरगिज़ हक़ीर मत जानो। वो चुप है यूं के वो खुद अपने शर से डरता है।। सब अ्पने वास्ते देते हैं जान अ-"ज्ञानेश"। किसी के वास्ते दुनियां में कौन मरता है।। हरगिज़ = कदापि,कभी हक़ीर = तुच्छ,छोटा
इसी तरह से तकब्बुर का शहर गिरता है। के जैसे आइना गिरता है और बिखरता है।। जो दूर होके भी हर दम क़रीब लगता है। वही तो है जो मुहोब्बत दिलों में भरता है।। कहीं पे कोई तलबगार तो नज़र आये। शऊर यूं ही फलक से कहां उतरता है।। भले ही लफ्जे़ मुहोब्बत का इल्म हो के न हो। जिसे भी देखो मुहोब्बत की बात करता है।। शरीफ़ शख़्स को हरगिज़ हक़ीर मत जानो। वो चुप है यूं के वो खुद अपने शर से डरता है।। सब अ्पने वास्ते देते हैं जान अ-"ज्ञानेश"। किसी के वास्ते दुनियां में कौन मरता है।। हरगिज़ = कदापि,कभी हक़ीर = तुच्छ,छोटा
इसी तरह से तकब्बुर का शहर गिरता है। के जैसे आइना गिरता है और बिखरता है।। जो दूर होके भी हर दम क़रीब लगता है। वही तो है जो मुहोब्बत दिलों में भरता है।। कहीं पे कोई तलबगार तो नज़र आये। शऊर यूं ही फलक से कहां उतरता है।। भले ही लफ्जे़ मुहोब्बत का इल्म हो के न हो। जिसे भी देखो मुहोब्बत की बात करता है।। शरीफ़ शख़्स को हरगिज़ हक़ीर मत जानो। वो चुप है यूं के वो खुद अपने शर से डरता है।। सब अ्पने वास्ते देते हैं जान अ-"ज्ञानेश"। किसी के वास्ते दुनियां में कौन मरता है।। हरगिज़ = कदापि,कभी हक़ीर = तुच्छ,छोटा ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी
Tuesday, September 24, 2019
कैसा काम घिनौना कर डाला
भाजपा तूने कैसा काम घिनौना कर डाला
संत रविदास का मंदिर क्यों तुड़वा डाला।।
एक तरफ तुम कब से अयोध्या मंदिर-मंदिर चिल्लाये हो।
रविदास का छः सौ साल पुराना बना मंदिर तुड़वाये हो।।
मंदिर रविदास किसी की आस्था का प्रतीक तोड़कर।
क्या साबित करना चाहते हो उनका विश्वास तोड़कर।।
मूल निवासी को कष्ट पहुंचाकर खुश होते हो।
बाहर से आबड़े आर्य तुम क्यों यहां रहते हो।।
तनिक भी शर्म रही हो तो अयोध्या में राम मंदिर के बदले रविदास मंदिर बनवा दो।
अपने दिलों से दुष्टतापूर्ण विचारों को बाहर कर किसी की आस्था को समझा दो।।
रचनाकार
ज्ञानेश्वरानन्द भारती
राजस्व एवं कर निरीक्षक
Monday, September 23, 2019
इस निर्दयी संसार में
हे! प्रभु तेरे इस निर्दयी संसार में।
क्या एक दूसरे को नोच खायेंगे।।
कहां गए वो मिटने वाले प्यार में।
धोखा देने की रीति से क्या पायेंगे।।
इंसान में हैवान के लक्षण व्यवहार में।
प्राण निछावर कर दोस्त की खातिर
खुदा दोस्त बन नाम अमर कर जायेंगे।
रचनाकार
ज्ञानेश्वरानन्द भारती
राजस्व एवं कर निरीक्षक
© ® रचना के सर्वाधिकार सुरक्षित हैं।
"समाज का आईना"
ग़ज़ल
जो नफरतें हैं तुम्हारे दिल में,
काश ये सियासत यूँ न होती।
जो खुलूस था मेरे दिल में,
आज उसका भरम न होता।
हसरतें कितनी बढ़ गई इंसां की,
काश थोड़े में गुजारा होता।
कभी माँ बाप रहते थे साथ में,
आज बेटा उनसे न्यारा न होता।
माँ के बलिदानों का जरा सा भी,
अहसास दिल में हुआ होता।
टुकड़ा देने से पहले प्यार से बेटा,
एक बार मुख से बोला होता।
अपनी व्यथा को यूँ ही सहकर,
कोई बाप छुपकर रोया न होता ।
कहाँ गए वो रस्मों रिवाज दुनिया,
"भारती" आज लौटा दिया होता।
रचनाकार
ज्ञानेश्वर आनन्द "ज्ञानेश" किरतपुरी
राजस्व एवं कर निरीक्षक
किरतपुर (बिजनौर)
© Copyright
उसे बुरा ना लगे
ध्यान रहे के उसे बुरा ना लगे।।
बात कहूं तो उसे बुरा ना लगे।।
ज़ाहिर नहीं की के बुरा ना लगे।।
सोचता हूं के उसे बुरा ना लगे।।
कह दूं तो कहीं उसे बुरा ना लगे।।
सुकूं से रहने दो मुझे बुरा ना लगे।।
तिरछी नजरें ही कहीं छुरा ना लगे।।
ज्ञानेश्वरानन्द "भारती"
कर निरीक्षक
© All Rights Reserved me.