हे! प्रभु तेरे इस निर्दयी संसार में।
क्या एक दूसरे को नोच खायेंगे।।
कहां गए वो मिटने वाले प्यार में।
धोखा देने की रीति से क्या पायेंगे।।
इंसान में हैवान के लक्षण व्यवहार में।
प्राण निछावर कर दोस्त की खातिर
खुदा दोस्त बन नाम अमर कर जायेंगे।
रचनाकार
ज्ञानेश्वरानन्द भारती
राजस्व एवं कर निरीक्षक
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