ग़ज़ल
जो नफरतें हैं तुम्हारे दिल में,
काश ये सियासत यूँ न होती।
जो खुलूस था मेरे दिल में,
आज उसका भरम न होता।
हसरतें कितनी बढ़ गई इंसां की,
काश थोड़े में गुजारा होता।
कभी माँ बाप रहते थे साथ में,
आज बेटा उनसे न्यारा न होता।
माँ के बलिदानों का जरा सा भी,
अहसास दिल में हुआ होता।
टुकड़ा देने से पहले प्यार से बेटा,
एक बार मुख से बोला होता।
अपनी व्यथा को यूँ ही सहकर,
कोई बाप छुपकर रोया न होता ।
कहाँ गए वो रस्मों रिवाज दुनिया,
"भारती" आज लौटा दिया होता।
रचनाकार
ज्ञानेश्वर आनन्द "ज्ञानेश" किरतपुरी
राजस्व एवं कर निरीक्षक
किरतपुर (बिजनौर)
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Monday, September 23, 2019
"समाज का आईना"
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महोदय मेरे ब्लॉग पर पब्लिक कमेंट कैसे प्राप्त होंगे?
कृपया मार्गदर्शन करें धन्यवाद