Tuesday, November 30, 2021

ग़ज़ल

ग़ज़ल

वैसे मैंने अभी तक किया तो नहीं।
प्यार "ज्ञानेश" करना ख़ता तो नहीं।।

आपको  जो भी  कहना था, सब कह दिया?
आपको हमसे अब कुछ , गिला तो नहीं।।

किस लिए मुझपे बाग़ी का इल्ज़ाम है।
झूठ को झूठ कहना,  ख़ता तो नहीं।।

तोहफातन फूल भेजे हैं, किसने हमें।
ये हमारी वफ़ा का, सिला तो नहीं।।

जाने क्यों उनकी नज़रों में, मुजरिम हैं हम।
जबकि कुछ हमसे ऐसा हुआ तो नहीं।

हमने दिल खोलकर रख दिया सामने।
यानि अब आपसे कुछ, छुपा तो नहीं।।

मैं दुआ जानता हूँ, पता तो करो।
उसके लब पे कहीं बद्दुआ तो नहीं।।

स्वरचित एवं मौलिक ग़ज़ल के समस्त ©® अधिकार सुरक्षित हैं।
ग़ज़लकार
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी
राजस्व एवं कर निरीक्षक

Sunday, November 28, 2021

नशा मुक्ति पर स्वरचित दोहे

नशा मुक्ति पर कुछ दोहे लिखे हैं-👇 
1-दुनिया में नशा मुक्ति का, हो कोई अभियान।
   जीवन  बचे  कलंक से,   समझो ए नादान।।
2- धूम्रपान से लाभ नहीं, खुद का भी नुक्सान।
    धूम्रपान को त्याग कर, मिलता है सम्मान।।
3- दिल से जो कोशिश करें, छोड़े वो धूम्रपान।
    जीवन सफल बनाइए , छोड़ कर धूम्रपान।।
4- नित नित  बढ़ती है सदा , गृह कलेश की बात।
    दिन काटे कटता नहीं ,  कटै नहीं ये रात।।
5- शराबी जब नशा करे , घर में करें उत्पात।
    तिल-तिल कर मिटती रहे, यह नारी की जात।।
6-खुशियाँ भी ओझल हुईं, सुख मिले नहीं चैन।
   जीवन दूभर हो रहा , दिन हो चाहे रैन।।
7-नशा बना अभिशाप है, हो शरीर का नाश।
   जगत में नशा आज तो, बना गले का फाँस।।
8-कलंक बने समाज में, नशा पाप का मूल।
   घुटन सी महसूस करे,चुभता जैसे शूल।।
9- छोड़ो नशा तुम आज से, करो प्रतिज्ञा आज।
     खुशियों से घर हो भरा, बैठो बीच समाज।।10-नज़रें बच्चों पर रखें, दियो उन्हें समझाय।
      संग नशे का है बुरा, निकट कभी ना जाय।।
11- नशा एक नासूर है, रहिए इससे दूर।
      मान घटे संसार में, साए भी हों दूर।।
12- करिए मदद ग़रीब की,अच्छे कीजै काम।
      ग़ैर का भी हो भला, हो अपना भी नाम।।
13-"ज्ञानेश" इस समाज में, कियो कोई सुधार।
      जीवन सफल बनाइए, कर कोई उपकार।।
            दोहाकार 
ज्ञानेश्वर आनन्द "ज्ञानेश" किरतपुरी
बसी किरतपुर
जनपद बिजनौर (उत्तर प्रदेश)

Monday, November 1, 2021

ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी के दोहे



ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी के दोहे 

१- देने से घटता नहीं,  बढ़ता है दिन-रात।
     विद्या-धन संसार में , बाँट सके नहि भ्रात।।

२- जगत में भ्रष्टाचार का, फैला ऐसा जाल ।
    सत्य भुला कर मित्र भी, कुटिल चले है चाल।।
    
३ -भ्रष्टाचारी मौज करें, हैं परिश्रमी मलाल।
    शिक्षा के घोटाले में, लोभी फँसे दलाल।।

४- देखो निंदकों का तुम, दिल से करना मान।
    जिनसे भीतर छुपि कमी, का मिलता है ज्ञान।।

५- रोज नए प्रयोग काव्य, सिरजन का हो ध्यान।
    त्याग कुरीति  सँसार की, करो काव्य सोपान ।।
     
६- मिटे साँसारिक कुरीति, अरु दूर हो अज्ञान।
     सम्मान धनी का होवै, निर्धन का भी मान।।
    
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मजदूरों के दर्द पर "ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश" के दोहे

१- लॉकडाउन में फँस गए,  बेचारे मजदूर।
     खाने को भोजन नहीं, घर से हैं अति दूर।।

२- मालिक पल्ला झाड़ी कै, खड़े हुए हैं दूर।
     संकट की इन घड़ियों में, भूख बनी नासूर।।
      
३- प्रशासन कुछ करे नहीं, भूखे हैं मजदूर।
     पैदल चलने पर सभी, बेबस हैं मजबूर।।
     
 ४-घर जाने को वापसी, पैदल चले मजदूर।
    मिली उन्हें गाड़ी नहीं, पाँव हुए मजबूर।।
 
 ५- घर वापसी को पैदल, चल हुए चकनाचूर।
     पैरों में छाले पड़े, मंजिल है अति दूर।।
    

दोहा रचनाकार
ज्ञानेश्वर आनन्द "ज्ञानेश"
राजस्व एवं कर निरीक्षक
किरतपुर जिला बिजनौर
(उत्तर प्रदेश)