मफ़-ऊ-ला-त फ़ा-इ-ला-तुन फ़ा-इ-लुन
२२२१ २२२१ २१२२ २१२
ग़ज़ल
मिलने आज वो हमसे मित्र पुराने आए हैं।
फिर वो हमसे नज़दीकियाँ बढ़ाने आए हैं।।
अदब से दूर तलक नहीं है वास्ता जिनका।
बातें शऊर की वो हमको सिखाने आये हैं।।
पता नहीं खुद ही हमसे रूठ बैठे थे मियां।
सुना है अब उनके होश ठिकाने आये हैं।।
पता जिनको नहीं है खुद के हालातों का।
वो हाल तकदीर का मेरी बताने आये हैं।।
जो कभी बोलने को भी नहीं तैयार थे हमसे।
आज वो फिर हमारा दिल लुभाने आये हैं।।
जिनकी फितरत है दूसरों को दोषी करार की।
कोई इल्जाम क्या वो फिर लगाने आये हैं।।
भरोसा अब नहीं रहा हमें जिनकी बातों पर।
नया वो दाव कोई हम पर आजमाने आये हैं।।
"ज्ञानेश" उसने तो हमें ठुकरा ही दिया था।
सुना है फिर से वो हमको मनाने आये हैं।।
ग़ज़लकार
ज्ञानेश्वर आनन्द "ज्ञानेश" किरतपुरी
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