Saturday, May 22, 2021

ये दिल मचलता क्यों है।

ग़ज़ल
 १२२  १२२२   २२१२   २१२२
उसे देखकर ये दिल यूँ मचलता क्यों है।
तिरे आने से पहले दिल सँभलता क्यों है।।

तिरी याद आती है जब मुझे तन्हाई में।
इश्क़ की गर्मी से बदन जलता क्यों है।।

जब उसे मुझसे दूर ही जाना था तो।
प्यार आँखों से दिल में उतरता क्यों है।।

भोली सी सूरत क्या-क्या ज़ुल्म ढ़ाती है।
मेरा हर एक बोल उसे अख़रता क्यों है।

दुनिया जिसे नाहक बुरा समझती है।
ये इश्क़ ए जूनून दिल में पलता क्यों है।।

जब कोई उसकी बात करता है "ज्ञानेश"।
ये दिल टूट कर इतना बिखरता क्यों है।।

          ग़ज़लकार
ज्ञानेश्वर आनन्द "ज्ञानेश" किरतपुरी
राजस्व एवं कर निरीक्षक
ग़ज़ल के ©® सर्वाधिकार सुरक्षित हैं।

Friday, May 21, 2021

"अपनों को खोया है"

संवेदना भरी  ग़ज़ल
"अपनों को खोया है"

इस जहां में जिन्होंने अपनों को खोया है।
दिल पर पत्थर रखकर वो बहुत रोया है।।

कल तलक जिसको सामने बैठे देखा था।
कोरोना ने अपनों को दूर कर कैसे खोया है।।

सपना सा लगता है कल ही की तो बात है।
खाने को रोज की तरह हाथ अपना धोया है।।

आज अपने भी नहीं अपने दिखाई दे रहे हैं।
आज उसी का नाम उसने दिलों पर बोया है।।

जिंदगी कैसे-कैसे इम्तिहान लेती है "ज्ञानेश"।
चुन चुन कर यादों को मोती सा पिरोया है।।

ग़ज़लकार
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी
राजस्व एवं कर निरीक्षक
ग़ज़ल के समस्त अधिकार ©® सुरक्षित हैं।

Saturday, May 8, 2021

मफ़-ऊ-ला-त    फ़ा-इ-ला-तुन  फ़ा-इ-लुन
२२२१     २२२१       २१२२          २१२

ग़ज़ल

मिलने आज वो हमसे मित्र पुराने आए हैं।
फिर वो हमसे नज़दीकियाँ  बढ़ाने आए हैं।।

अदब से दूर तलक नहीं है वास्ता जिनका।
बातें शऊर की वो हमको सिखाने आये हैं।।

पता नहीं खुद ही हमसे रूठ बैठे थे मियां।
सुना है अब उनके होश ठिकाने आये हैं।।

पता जिनको नहीं है खुद के हालातों का।
वो हाल तकदीर का मेरी बताने आये हैं।।

जो कभी बोलने को भी नहीं तैयार थे हमसे।
आज वो फिर हमारा दिल लुभाने आये हैं।।

जिनकी फितरत है दूसरों को दोषी करार की।
कोई इल्जाम क्या वो फिर लगाने आये हैं।।

भरोसा अब नहीं रहा हमें जिनकी बातों पर।
नया वो दाव कोई हम पर आजमाने आये हैं।।

"ज्ञानेश" उसने तो हमें ठुकरा ही दिया था।
सुना है फिर से वो हमको मनाने आये हैं।।

ग़ज़लकार
ज्ञानेश्वर आनन्द "ज्ञानेश" किरतपुरी
स्वरचित एवं मौलिक रचना के समस्त अधिकार सुरक्षित हैं। © ®

ग़ज़ल

फायलातुन- फायलातुन - फऊलुन -फऊलुन - मुतदारिक 
ग़ज़ल
अब हमें अपना मुकद्दर बनाना पड़ेगा।।
कुछ पाने को हाथ-पांव चलाना पड़ेगा।।

तुम गीतों में आनन्द तो चाहते हो मगर।
तुम्हें तरन्नुम से ग़ज़लों को गाना पड़ेगा।।

तुम्हें रश्मे उल्फत बढ़ाने से पहले मेरी जाँ।
दिल में मुहोब्बत का परचम लहराना पड़ेगा।।

मुश्किल में कुछ भी दिखाई नहीं देता अक्सर।
इस दिल की आंखों पे चश्मा लगाना पड़ेगा।।

खुदा का करम है या है मेरा ये मुकद्दर।
अब जिंदगी में मेरी तुमको आना पड़ेगा।।

क्या खबर थी के वबा फैलेगी "ज्ञानेश"।
कोरोना से घरों में सिमट जाना पड़ेगा।।

ग़ज़लकार
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी
स्वरचित एवं मौलिक रचना के समस्त अधिकार सुरक्षित हैं। © ®