छोड़ देती है दुनिया सबको रोते हुए।
देखा है नज़रों ने सब कुछ होते हुए।।
फाँसलों को भी कैसे मिटाओगे तुम।
मिल ना पाओगे तुम पास होते हुए।।
हमने आँसू तो बहने से रोके बहुत।
बह गए हैं वो पल्लू भिगोते हुए।।
अपने ही जब हमसे बिछुड़ने लगे।
धागा बनें माला मोती पिरोते हुए।।
पढ़ी थी तरन्नुम से जो ग़ज़ल आपने।
दिल से ज्ञानेश को भी संजोते हुए।।
ग़ज़लकार
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी
राजस्व एवं कर निरीक्षक
ग़ज़ल के समस्त ©® अधिकार सुरक्षित हैं।