Monday, January 3, 2022

ग़ज़ल

ग़ज़ल 

             चाँद चेहरे
उस पे उस विधाता को, आक्रोश आता है ।
जो किसी भी इंसाँ को, बेसबब सताता है।।

रोज़ मर रहा हूं मैं, इस तड़प के ख़ंज़र से।
मेरा क़त्ल क्यों मुन्सिफ, शहर से छुपाता है।।

इस क़दर सताया है, मुझको चाँद चेहरे ने। 
दर्द से कलेजा तक, भाई मुँह को आता है।।

मेरे शहर में ऐसा, एक अजब शराबी है।
रोज़ ही कमाता है, रोज़ ही गँवाता है।।

उससे क्या बताऊँ मैं, अपने दिल की बेताबी।
वो मेरी ज़रूरत का, फायदा उठाता है।।

देख कर उसे "ज्ञानेश", आँख ने कहा दिल से।
इस हसीं से लगता है, हर जनम का नाता है।।

ग़ज़लकार
ज्ञानेश्वर आनन्द "ज्ञानेश" किरतपुरी
राजस्व एवं कर निरीक्षक
सम्पर्क सूत्र-

Saturday, January 1, 2022

प्यार ज्ञानेश करना ख़ता तो नहीं।

वैसे मैंने अभी तक, किया तो नहीं।
प्यार ज्ञानेश करना, ख़ता तो नहीं।।

जाने क्यों उनकी नज़रों में, मुजरिम हैं हम।
जबकि कुछ हमसे ऐसा हुआ तो नहीं।।
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी